श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 106: नारदजीका दुर्योधनको समझाते हुए धर्मराजके द्वारा विश्वामित्रजीकी परीक्षा तथा गालवके विश्वामित्रसे गुरुदक्षिणा माँगनेके लिये हठका वर्णन  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  5.106.20-21 
अनुज्ञातो मया वत्स यथेष्टं गच्छ गालव।
इत्युक्त: प्रत्युवाचेदं गालवो मुनिसत्तमम्॥ २०॥
प्रीतो मधुरया वाचा विश्वामित्रं महाद्युतिम्।
दक्षिणा: का: प्रयच्छामि भवते गुरुकर्मणि॥ २१॥
 
 
अनुवाद
पुत्र गालव! अब मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, जहाँ चाहो वहाँ जाओ।' उनकी आज्ञा पाकर गालव ने प्रसन्नता व्यक्त की और मधुर वाणी में महाबली ऋषि विश्वामित्र से पूछा - 'भगवन्! मैं आपको गुरुदक्षिणा में क्या दूँ?'
 
Son Galava! Now I command you, go wherever you wish.' On his order, Galava expressed his happiness and asked the mighty sage Vishwamitra in a sweet voice - 'Lord! What should I give you as Gurudakshina?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)