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श्री महाभारत
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पर्व 5: उद्योग पर्व
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अध्याय 106: नारदजीका दुर्योधनको समझाते हुए धर्मराजके द्वारा विश्वामित्रजीकी परीक्षा तथा गालवके विश्वामित्रसे गुरुदक्षिणा माँगनेके लिये हठका वर्णन
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श्लोक 19
श्लोक
5.106.19
विश्वामित्रस्तु शिष्यस्य गालवस्य तपस्विन:।
शुश्रूषया च भक्त्या च प्रीतिमानित्युवाच ह॥ १९॥
अनुवाद
अपने शिष्य तपस्वी गालव मुनि की सेवा, देखभाल और भक्ति से संतुष्ट होकर उन्होंने कहा - 19॥
Satisfied with the service, care and devotion of his disciple ascetic Galav Muni, he said - 19॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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