श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 106: नारदजीका दुर्योधनको समझाते हुए धर्मराजके द्वारा विश्वामित्रजीकी परीक्षा तथा गालवके विश्वामित्रसे गुरुदक्षिणा माँगनेके लिये हठका वर्णन  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  5.106.16-17 
स दृष्ट्वा शिरसा भक्तं ध्रियमाणं महर्षिणा।
तिष्ठता वायुभक्षेण विश्वामित्रेण धीमता॥ १६॥
प्रतिगृह्य ततो धर्मस्तथैवोष्णं तथा नवम्।
भुक्त्वा प्रीतोऽस्मि विप्रर्षे तमुक्त्वा स मुनिर्गत:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने देखा कि परम बुद्धिमान ऋषि विश्वामित्र सिर पर अन्न का पात्र रखे खड़े हैं और केवल वायु पी रहे हैं। यह देखकर धर्म ने भोजन ग्रहण किया। भोजन ताजे बने हुए अन्न के समान गरम था। उसे खाकर उन्होंने कहा - 'ब्रह्मर्षि! मैं आप पर अत्यंत प्रसन्न हूँ।' ऐसा कहकर ऋषि वेशधारी धर्मदेव वहाँ से चले गए॥16-17॥
 
He saw that the most intelligent sage Vishwamitra was standing with a food bowl on his head, drinking only air. Seeing this, Dharma took the food. The food was as hot as freshly prepared food. After eating it, he said - 'Brahmarshi! I am very pleased with you.' Saying this, Dharmadev, dressed as a sage, left.॥16-17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)