श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 106: नारदजीका दुर्योधनको समझाते हुए धर्मराजके द्वारा विश्वामित्रजीकी परीक्षा तथा गालवके विश्वामित्रसे गुरुदक्षिणा माँगनेके लिये हठका वर्णन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  5.106.14 
तस्य शुश्रूषणे यत्नमकरोद् गालवो मुनि:।
गौरवाद् बहुमानाच्च हार्देन प्रियकाम्यया॥ १४॥
 
 
अनुवाद
उन दिनों गालव ऋषि अपने गौरव, विशेष आदर और प्रेम के कारण उनकी प्रसन्नता के लिए यत्नपूर्वक उनका ध्यान रखते थे ॥14॥
 
In those days, due to his sense of pride, special respect and love for him, Sage Galav used to diligently take care of him for his happiness. 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)