श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 105: भगवान‍् विष्णुके द्वारा गरुड़का गर्वभंजन तथा दुर्योधनद्वारा कण्व मुनिके उपदेशकी अवहेलना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  5.105.2 
पक्षवातेन महता रुद्‍ध्वा त्रिभुवनं खग:।
सुपर्ण: परमक्रुद्धो वासवं समुपाद्रवत्॥ २॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर गरुड़ बहुत क्रोधित हो गया और अपने पंखों की भयंकर हवा से तीनों लोकों को हिलाता हुआ इंद्र की ओर दौड़ा।
 
On hearing this, the flying Garuda became very angry and rushed towards Indra, shaking all the three worlds with the fierce wind of his wings.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)