श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 104: नारदजीका नागराज आर्यकके सम्मुख सुमुखके साथ मातलिकी कन्याके विवाहका प्रस्ताव एवं मातलिका नारदजी, सुमुख एवं आर्यकके साथ इन्द्रके पास आकर उनके द्वारा सुमुखको दीर्घायु प्रदान कराना तथा सुमुख-गुणकेशी-विवाह  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  5.104.9 
पौत्रस्यार्थे भवांस्तस्माद् गुणकेशीं प्रतीच्छतु।
सदृशीं प्रतिरूपस्य वासवस्य शचीमिव॥ ९॥
 
 
अनुवाद
अतः आप कृपया अपने पौत्र के लिए गुणकेशी को स्वीकार करें। जैसे शची इन्द्र के लिए उपयुक्त है, वैसे ही गुणकेशी आपके योग्य पौत्र के लिए उपयुक्त है।॥9॥
 
Therefore, please accept Gunakeshi for your grandson. Just as Shachi is suitable for Indra, Gunakeshi is suitable for your worthy grandson.॥ 9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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