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श्लोक 5.104.3  |
अयं हरिसहस्रेण युक्तं जैत्रं रथोत्तमम्।
देवासुरेषु युद्धेषु मनसैव नियच्छति॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| देवताओं और दानवों के युद्ध में वे अपने मन के संकल्प मात्र से ही देवराज के हजार घोड़ों से जुते हुए विजयी रथ को नियंत्रित करते हैं ॥3॥ |
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| In the war between gods and demons, He controls the victorious chariot of the King of Gods drawn by a thousand horses just by His mental resolve. ॥ 3॥ |
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