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mahabharat 5.104.3: देवताओं और दानवों के युद्ध में वे अपने मन के संकल्प मात्र से ही देवराज के हजार घोड़ों से जुते हुए विजयी रथ को नियंत्रित करते हैं ॥3॥   |   mahabharat अध्याय 5.104: नारदजीका नागराज आर्यकके सम्मुख सुमुखके साथ मातलिकी कन्याके विवाहका प्रस्ताव एवं मातलिका नारदजी, सुमुख एवं आर्यकके साथ इन्द्रके पास आकर उनके द्वारा सुमुखको दीर्घायु प्रदान कराना तथा सुमुख-गुणकेशी-विवाह   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 104: नारदजीका नागराज आर्यकके सम्मुख सुमुखके साथ मातलिकी कन्याके विवाहका प्रस्ताव एवं मातलिका नारदजी, सुमुख एवं आर्यकके साथ इन्द्रके पास आकर उनके द्वारा सुमुखको दीर्घायु प्रदान कराना तथा सुमुख-गुणकेशी-विवाह  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  5.104.3 
अयं हरिसहस्रेण युक्तं जैत्रं रथोत्तमम्।
देवासुरेषु युद्धेषु मनसैव नियच्छति॥ ३॥
 
 
अनुवाद
देवताओं और दानवों के युद्ध में वे अपने मन के संकल्प मात्र से ही देवराज के हजार घोड़ों से जुते हुए विजयी रथ को नियंत्रित करते हैं ॥3॥
 
In the war between gods and demons, He controls the victorious chariot of the King of Gods drawn by a thousand horses just by His mental resolve. ॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)