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mahabharat 5.104.28: तब इन्द्र ने उस सर्प को अच्छा जीवनदान दिया, परन्तु बलासुर और वृत्रासुर का नाश करने वाले इन्द्र ने उसे अमृतपान करने वाला नहीं बनाया ॥28॥   |   mahabharat अध्याय 5.104: नारदजीका नागराज आर्यकके सम्मुख सुमुखके साथ मातलिकी कन्याके विवाहका प्रस्ताव एवं मातलिका नारदजी, सुमुख एवं आर्यकके साथ इन्द्रके पास आकर उनके द्वारा सुमुखको दीर्घायु प्रदान कराना तथा सुमुख-गुणकेशी-विवाह   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 104: नारदजीका नागराज आर्यकके सम्मुख सुमुखके साथ मातलिकी कन्याके विवाहका प्रस्ताव एवं मातलिका नारदजी, सुमुख एवं आर्यकके साथ इन्द्रके पास आकर उनके द्वारा सुमुखको दीर्घायु प्रदान कराना तथा सुमुख-गुणकेशी-विवाह  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  5.104.28 
प्रादाच्छक्रस्ततस्तस्मै पन्नगायायुरुत्तमम्।
न त्वेनममृतप्राशं चकार बलवृत्रहा॥ २८॥
 
 
अनुवाद
तब इन्द्र ने उस सर्प को अच्छा जीवनदान दिया, परन्तु बलासुर और वृत्रासुर का नाश करने वाले इन्द्र ने उसे अमृतपान करने वाला नहीं बनाया ॥28॥
 
Then Indra gave a good life to that snake, but Indra, who destroyed Balasura and Vritrasura, did not make him a nectar-eater. 28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)