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mahabharat 5.103.18: कण्व ऋषि कहते हैं - हे राजन! तब मातलि एक सर्प को स्थिर और निरंतर देखकर प्रसन्न हो गये और उन्होंने नारदजी से पूछा।   |   mahabharat अध्याय 5.103: नागलोकके नागोंका वर्णन और मातलिका नागकुमार सुमुखके साथ अपनी कन्याको ब्याहनेका निश्चय   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  5.103.18 
कण्व उवाच
मातलिस्त्वेकमव्यग्र: सततं संनिरीक्ष्य वै।
पप्रच्छ नारदं तत्र प्रीतिमानिव चाभवत्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
कण्व ऋषि कहते हैं - हे राजन! तब मातलि एक सर्प को स्थिर और निरंतर देखकर प्रसन्न हो गये और उन्होंने नारदजी से पूछा।
 
Sage Kanva says - O King! Then Matali became pleased after observing a snake steadily and continuously and he asked Naradji.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)