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mahabharat 5.102.4: पृथ्वी पर निरन्तर गिरती हुई सुगन्धित दूध की धारा से एक अनन्त हृदय का निर्माण हुआ, जिसे 'क्षीर सागर' कहते हैं। वह अत्यन्त पवित्र है ॥4॥   |   mahabharat अध्याय 5.102: सुरभि और उसकी संतानोंके साथ रसातलके सुखका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 5: उद्योग पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 102: सुरभि और उसकी संतानोंके साथ रसातलके सुखका वर्णन  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  5.102.4 
यस्या: क्षीरस्य धाराया निपतन्त्या महीतले।
ह्रद: कृत: क्षीरनिधि: पवित्रं परमुच्यते॥ ४॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वी पर निरन्तर गिरती हुई सुगन्धित दूध की धारा से एक अनन्त हृदय का निर्माण हुआ, जिसे 'क्षीर सागर' कहते हैं। वह अत्यन्त पवित्र है ॥4॥
 
The stream of fragrant milk falling continuously on the earth formed an infinite heart, which is called 'Ksheera Sagar'. It is extremely pure. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)