अध्याय 102: सुरभि और उसकी संतानोंके साथ रसातलके सुखका वर्णन
श्लोक 1: नारदजी बोले - मातले! यह पृथ्वी का सातवाँ लोक है, जिसे रसातल कहते हैं। यहाँ अमृत से उत्पन्न हुई गौ माता सुरभि रहती है॥1॥
श्लोक 2: पृथ्वी के सार से प्रकट हुई, छह रसों के सार से संयुक्त, तथा सर्वोत्तम, अवर्णनीय नीरस दूध से युक्त यह सुन्दरी स्त्री सदैव अपने स्तनों से प्रवाहित होती रहती है।
श्लोक 3: पूर्वकाल में जब ब्रह्मा जी अमृत पीकर तृप्त हो गए और उसका सार अपने मुख से उगल रहे थे, उसी समय उनके मुख से आनन्दित नामक सुगन्धित अमृत निकला।
श्लोक 4: पृथ्वी पर निरन्तर गिरती हुई सुगन्धित दूध की धारा से एक अनन्त हृदय का निर्माण हुआ, जिसे 'क्षीर सागर' कहते हैं। वह अत्यन्त पवित्र है ॥4॥
श्लोक 5: क्षीरसागर से जो झाग उत्पन्न होता है, वह पुष्प के समान दिखाई देता है। वह झाग क्षीरसागर के तट पर फैला रहता है। उसे पीकर झाग-प्रेमी अनेक महर्षि इस रसातल में निवास करते हैं ॥5॥
श्लोक 6: हे मातले! ये महर्षि झाग खाने के कारण 'फेनप' नाम से प्रसिद्ध हैं। ये अत्यन्त कठोर तपस्या में लीन रहते हैं। देवता भी इनसे भयभीत रहते हैं।
श्लोक 7: हे माता! चार गौएँ और हैं जो सुरभि की पुत्रियाँ हैं और सम्पूर्ण दिशाओं में निवास करती हैं। वे ही दिशाओं का पालन और पोषण करती हैं॥7॥
श्लोक 8: सुरूपा नामक धेनु पूर्व दिशा को धारण करती है और उसके विपरीत हंसिका नामक धेनु दक्षिण दिशा को धारण करती है ॥8॥
श्लोक 9: मटाले! वरुणदेव की पश्चिम दिशा अत्यंत प्रभावशाली विश्वरूपा सुभद्रा नामक सुरभिकन्या के पास है। 9॥
श्लोक 10: चौथी धेनुका को सर्वकाम दूहा कहते हैं। माँ! यह कुबेर से संबंधित हैं और उत्तर दिशा की वाहक हैं। 10.
श्लोक 11-12: देवसरते! देवताओं ने दैत्यों के साथ मिलकर मंदराचल को मथानी बनाकर इन भैंसों के दूध के साथ क्षीरसागर का मंथन किया और उससे वारुणी, लक्ष्मी और अमृत प्रकट किए। तत्पश्चात समुद्र मंथन से अश्वराज उच्चै:श्रवा और मणि कौस्तुभ भी प्रकट हुए। 11-12॥
श्लोक 13: सुरभि के स्तनों से जो दूध निकलता है, वह अन्न खाने वाले मनुष्यों के लिए सुधा है, अन्न खाने वाले पितरों के लिए स्वधा है और अमृत खाने वाले देवताओं के लिए अमृत है।
श्लोक 14: पूर्वकाल में पातालवासियों द्वारा गायी गई वह प्राचीन कथा आज भी संसार में सुनी जाती है और बुद्धिमान पुरुषों द्वारा गाई जाती है ॥14॥
श्लोक 15: वह कथा इस प्रकार है – ‘नागलोक, स्वर्गलोक और स्वर्गलोक विमान में रहना उतना सुखदायक नहीं है, जितना रसातल में रहना है।’ 15॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥