श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 100: हिरण्यपुरका दिग्दर्शन और वर्णन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  5.100.19 
अन्यत्र साधु गच्छाव द्रष्टुं नार्हामि दानवान्।
जानामि तव चात्मानं हिंसात्मकमनं तथा॥ १९॥
 
 
अनुवाद
अतः अच्छा होगा कि हम लोग किसी अन्य स्थान पर चलें। मैं राक्षसों से मिल भी नहीं सकता। मैं यह भी जानता हूँ कि आपके मन में हिंसात्मक कार्य (युद्ध) का अवसर उत्पन्न करने की प्रबल इच्छा है॥19॥
 
‘Therefore it would be better if we go to some other place. I cannot even meet the demons. I also know that you have a strong desire to create an opportunity for a violent act (war)’॥ 19॥
 
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि मातलिवरान्वेषणे शततमोऽध्याय:॥ १००॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें मातलिके द्वारा वरका खोजविषयक सौवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १००॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)