श्री महाभारत  »  पर्व 5: उद्योग पर्व  »  अध्याय 10: इन्द्रसहित देवताओंका भगवान‍् विष्णुकी शरणमें जाना और इन्द्रका उनके आज्ञानुसार वृत्रासुरसे संधि करके अवसर पाकर उसे मारना एवं ब्रह्महत्याके भयसे जलमें छिपना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  5.10.45 
सोऽन्तमाश्रित्य लोकानां नष्टसंज्ञो विचेतन:।
न प्राज्ञायत देवेन्द्रस्त्वभिभूत: स्वकल्मषै:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
वे समस्त लोकों की अंतिम सीमा पर जाकर अचेत अवस्था में रहने लगे। अपने ही पापों के कारण कष्ट भोग रहे देवेन्द्र का किसी को पता नहीं चला। 45.
 
He went to the last boundary of all the worlds and started living there in a trance and unconscious state. No one came to know of Devendra who was suffering due to his own sins. 45.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)