वैशम्पायन उवाच
एवं कृष्णा विराटस्य भार्यया परिसान्त्विता॥ ३६॥
उवास नगरे तस्मिन् पतिधर्मवती सती।
न चैनां वेद तत्रान्यस्तत्त्वेन जनमेजय॥ ३७॥
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - जब विराट की रानी ने यह आश्वासन दिया, तब पतिव्रता धर्म का पालन करने वाली पतिव्रता द्रौपदी उस नगर में रहने लगी। हे जनमेजय! वहाँ कोई अन्य व्यक्ति उसका वास्तविक स्वरूप नहीं जान सका। 36-37।
Vaishampayana says - When Virat's queen gave this assurance, then the chaste Draupadi, who followed the duty of being faithful to her husband, started living in that city. O Janamejaya! No other person there could know her true identity. 36-37.
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि द्रौपदीप्रवेशे नवमोऽध्याय:॥ ९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें द्रौपदीप्रवेशसम्बन्धी नवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)