का त्वं ब्रूहि यथा भद्रे नासि दासी कथंचन।
यक्षी वा यदि वा देवी गन्धर्वी यदि वाप्सरा:॥ १४॥
देवकन्या भुजङ्गी वा नगरस्याथ देवता।
विद्याधरी किन्नरी वा यदि वा रोहिणी स्वयम्॥ १५॥
अनुवाद
कल्याणी! बताओ, तुम वास्तव में कौन हो? तुम किसी भी प्रकार दासी नहीं हो सकतीं। तुम यक्षी हो या देवी? गंधर्वकन्या हो या अप्सरा? देवकन्या हो या नागकन्या? या तुम इस नगर की अधिष्ठात्री देवी नहीं हो? क्या तुम विद्याधरी, किन्नरी या साक्षात् चंद्रदेव की पत्नी रोहिणी नहीं हो? 14-15॥
Kalyani! Tell me, who are you really? You cannot be a slave in any way. Are you a Yakshi or a Goddess? Gandharvakanya or Apsara? Devkanya or Naagkanya? Or aren't you the presiding deity of this city? Are you not Vidyadhari, Kinnari or Rohini, wife of Chandradev in person? 14-15॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)