श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 72: अर्जुनका अपनी पुत्रवधूके रूपमें उत्तराको ग्रहण करना एवं अभिमन्यु और उत्तराका विवाह  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  4.72.17-18 
अक्षौहिण्या च सहितो यज्ञसेनो महाबल:।
द्रौपद्याश्च सुता वीरा: शिखण्डी चापराजित:॥ १७॥
धृष्टद्युम्नश्च दुर्धर्ष: सर्वशस्त्रभृतां वर:।
समस्ताक्षौहिणीपाला यज्वानो भूरिदक्षिणा:।
वेदावभृथसम्पन्ना: सर्वे शूरास्तनुत्यज:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
महाबली राजा द्रुपद भी एक अक्षौहिणी सेना लेकर आ पहुँचे। उनके साथ द्रौपदी के पाँचों वीर पुत्र, कभी पराजित न होनेवाला शिखण्डी और समस्त शस्त्रधारियों में सबसे वीर एवं पराक्रमी धृष्टद्युम्न भी थे। इनके अतिरिक्त और भी बहुत से राजा वहाँ आए, उनमें से प्रत्येक अक्षौहिणी सेना का रक्षक, यज्ञ करनेवाला, यज्ञों में सबसे अधिक दक्षिणा देनेवाला, वेद और अवभृत (यज्ञनाथ) स्नान में पारंगत, वीर और पाण्डवों के लिए प्राण देनेवाला था। 17-18॥
 
Mahabali King Drupada also arrived with an Akshauhini army. Along with them were the five valiant sons of Draupadi, Shikhandi who could never be defeated and Dhrishtadyumna, the bravest and bravest among all the armed men. Apart from these, many other kings also came there, each one of them was the guardian of the Akshauhini army, the one who performed the yagyas, the one who gave maximum dakshina in the yagyas, the one who was proficient in the Vedas and Avabhrit (Yagyanth) bath, the brave one and the one who gave his life for the Pandavas. 17-18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)