विराट उवाच
उपपन्नं कुरुश्रेष्ठे कुन्तीपुत्र धनंजये।
य एवं धर्मनित्यश्च जातज्ञानश्च पाण्डव:॥ १०॥
यत् कृत्यं मन्यसे पार्थ क्रियतां तदनन्तरम्।
सर्वे कामा: समृद्धा मे सम्बन्धी यस्य मेऽर्जुन:॥ ११॥
अनुवाद
विराट बोले—पार्थ! तुम कौरवों में श्रेष्ठ और कुन्तीदेवी के पुत्र हो। धनंजय का धर्म के प्रति ऐसा दृष्टिकोण रखना उचित ही है। केवल पाण्डुपुत्र अर्जुन ही धर्म के प्रति इतना समर्पित और ज्ञानवान हो सकता है। अब इसके पश्चात् जो भी कर्तव्य तुम्हें उचित लगे, उसे पूरा करो। मेरी सारी इच्छाएँ पूरी हो गई हैं। जिसका सम्बन्धी अर्जुन हो, उसकी कौन सी इच्छा अधूरी रह सकती है?॥10-11॥
Virat said—Parth! You are the best among the Kauravas and Kuntidevi's son. It is right for Dhananjay to have such a view of Dharma. Only Pandu's son Arjuna can be so devoted to Dharma and full of knowledge. Now after this, whatever duty you think is right, complete it. All my wishes have been fulfilled. Which wish of the one whose relative Arjuna is being, can remain unfulfilled?॥10-11॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)