श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 71: विराटको अन्य पाण्डवोंका भी परिचय प्राप्त होना तथा विराटके द्वारा युधिष्ठिरको राज्य समर्पण करके अर्जुनके साथ उत्तराके विवाहका प्रस्ताव करना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  4.71.27 
यदस्माभिरजानद्भि: किंचिदुक्तो नराधिप:।
क्षन्तुमर्हति तत् सर्वं धर्मात्मा ह्येष पाण्डव:॥ २७॥
 
 
अनुवाद
हमने अनजाने में जो कुछ अनुचित वचन उनसे कहे हैं, उन्हें धर्मात्मा पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर क्षमा करें॥27॥
 
Whatever improper words we have unknowingly spoken to him, may the righteous King Yudhishthira, son of Pandu, forgive them. ॥ 27॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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