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श्लोक 4.71.22-23  |
वैशम्पायन उवाच
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा मत्स्यराज: प्रतापवान्।
उत्तरं प्रत्युवाचेदमभिपन्नो युधिष्ठिरे॥ २२॥
प्रसादनं पाण्डवस्य प्राप्तकालं हि रोचते।
उत्तरां च प्रयच्छामि पार्थाय यदि मन्यसे॥ २३॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायन कहते हैं - हे राजन! उत्तरा के ये वचन सुनकर युधिष्ठिर के अपराधी पराक्रमी मत्स्यराज अपने पुत्र से इस प्रकार बोले - 'पुत्र! पाण्डवों को प्रसन्न करने का समय आ गया है। यही मेरी इच्छा है। यदि तुम सहमत हो, तो मैं राजकुमारी उत्तरा का विवाह कुन्तीपुत्र अर्जुन के साथ कर दूँगा।' |
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| Vaishampayana says - O King! On hearing these words of Uttara, the mighty Matsya King, who was the culprit of Yudhishthira, spoke to his son in this manner - 'Son! The time has come to please the Pandavas. This is my wish. If you agree, then I will get the princess Uttara married to Kunti's son Arjuna. |
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