श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 71: विराटको अन्य पाण्डवोंका भी परिचय प्राप्त होना तथा विराटके द्वारा युधिष्ठिरको राज्य समर्पण करके अर्जुनके साथ उत्तराके विवाहका प्रस्ताव करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  4.71.17 
आभ्यां तु पार्श्वे कनकोत्तमाङ्गी
यैषा प्रभा मूर्तिमतीव गौरी।
नीलोत्पलाभा सुरदेवतेव
कृष्णा स्थिता मूर्तिमतीव लक्ष्मी:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उनके पास जो गौरी स्वरूपा तेजोमय देवी खड़ी हैं, जिनके सुन्दर अंग स्वर्णिम आभा बिखेर रहे हैं, जिनकी प्रभा नीलकमल की आभा को भी लज्जित कर रही है तथा जो देवाधिदेवी तथा साक्षात् लक्ष्मी के समान सुन्दर प्रतीत हो रही हैं, वह द्रुपद की पुत्री महारानी कृष्णा ही हैं॥17॥
 
The radiant Goddess standing beside them, like the embodiment of Gauri, whose beautiful body parts are radiating golden glow, whose radiance puts the glow of the blue lotus to shame and who looks as beautiful as the Goddess of Gods and Goddess Lakshmi incarnate, is none other than Drupada's daughter Maharani Krishna. ॥17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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