श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 70: अर्जुनका राजा विराटको महाराज युधिष्ठिरका परिचय देना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  4.70.8 
वैशम्पायन उवाच
परिहासेप्सया वाक्यं विराटस्य निशम्य तत्।
स्मयमानोऽर्जुनो राजन्निदं वचनमब्रवीत्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! विराट की विनोदपूर्वक कही हुई बातें सुनकर अर्जुन मुस्कुराये और इस प्रकार बोले।
 
Vaishmpayana says - Janamejaya! On hearing Virat's words as if they were said as a joke, Arjun smiled and spoke thus.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)