न शक्यन्ते ह्यस्य गुणा: प्रसंख्यातुं नरेश्वर।
एष धर्मपरो नित्यमानृशंसश्च पाण्डव:॥ २७॥
एवं युक्तो महाराज: पाण्डव: पार्थिवर्षभ:।
कथं नार्हति राजार्हमासनं पृथिवीपते॥ २८॥
अनुवाद
नरेश्वर! उसके गुणों की गणना नहीं की जा सकती। ये पाण्डुनन्दन सदैव धार्मिक और दयालु स्वभाव वाले हैं। राजन! समस्त राजाओं के शिरोमणि पाण्डुनन्दन महाराज युधिष्ठिर उत्तम गुणों से युक्त होने पर भी राजसिंहासन के अधिकारी क्यों नहीं हैं? 27-28॥
Nareshwar! His virtues cannot be counted. This Pandunandan is always religious and of kind nature. Rajan! Why is Pandu Nandan Maharaj Yudhishthir, the crown jewel of all the kings, not entitled to the throne despite being endowed with the best qualities? 27-28॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि वैवाहिकपर्वणि पाण्डवप्रकाशे सप्ततितमोऽध्याय:॥ ७०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें पाण्डवप्राकटॺविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७०॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)