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mahabharat 4.70.10-11: वे धर्म के स्वरूप हैं और शूरवीरों में श्रेष्ठ हैं। वे इस जगत् में सबसे बुद्धिमान् हैं और तपस्या के परम आश्रय हैं। वे नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को जानते हैं, जिन्हें इस चर-अचर जगत् में कोई अन्य व्यक्ति नहीं जानता और न कभी जान पाएगा।॥10-11॥   |   mahabharat अध्याय 4.70: अर्जुनका राजा विराटको महाराज युधिष्ठिरका परिचय देना   ।   mahabharat पर्व 4: विराट पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 70: अर्जुनका राजा विराटको महाराज युधिष्ठिरका परिचय देना  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  4.70.10-11 
एष विग्रहवान् धर्म एष वीर्यवतां वर:।
एष बुद्धॺाधिको लोके तपसां च परायणम्॥ १०॥
एषोऽस्त्रं विविधं वेत्ति त्रैलोक्ये सचराचरे।
न चैवान्य: पुमान् वेत्ति न वेत्स्यति कदाचन॥ ११॥
 
 
अनुवाद
वे धर्म के स्वरूप हैं और शूरवीरों में श्रेष्ठ हैं। वे इस जगत् में सबसे बुद्धिमान् हैं और तपस्या के परम आश्रय हैं। वे नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को जानते हैं, जिन्हें इस चर-अचर जगत् में कोई अन्य व्यक्ति नहीं जानता और न कभी जान पाएगा।॥10-11॥
 
He is the embodiment of Dharma and is the best among the valiant men. He is the most intelligent person in this world and the ultimate refuge of penance. He knows various types of weapons which no other person in this animate and inanimate world knows and will never know.॥10-11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)