श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 7: युधिष्ठिरका राजसभामें जाकर विराटसे मिलना और वहाँ आदरपूर्वक निवास पाना  »  श्लोक d6
 
 
श्लोक  4.7.d6 
स वै मयोक्तो वरद: पिता प्रभु:
सदैव मे धर्मरता मतिर्भवेत्।
इमे च जीवन्तु ममानुजा: प्रभो
वपुश्च रूपं च बलं तथाप्नुयु:॥
 
 
अनुवाद
तब मैंने अपने दयालु पिता भगवान धर्मराज से कहा - 'प्रभु! मेरा मन सदैव धर्म में ही लगा रहे और मेरे ये छोटे भाई जीवित हो जाएँ तथा अपना पूर्व रूप, यौवन और बल पुनः प्राप्त कर लें।
 
Then I said to my benevolent father Lord Dharmaraj - 'Prabhu! May my mind always remain focused on Dharma and may these younger brothers of mine become alive and regain their former beauty, youth and strength.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)