श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 7: युधिष्ठिरका राजसभामें जाकर विराटसे मिलना और वहाँ आदरपूर्वक निवास पाना  »  श्लोक 9-10
 
 
श्लोक  4.7.9-10 
इहाहमिच्छामि तवानघान्तिके
वस्तुं यथा कामचरस्तथा विभो।
तमब्रवीत् स्वागतमित्यनन्तरं
राजा प्रहृष्ट: प्रतिसंगृहाण च॥ ९॥
तं राजसिंहं प्रतिगृह्य राजा
प्रीत्याऽऽत्मना चैनमिदं बभाषे।
कामेन ताताभिवदाम्यहं त्वां
कस्यासि राज्ञो विषयादिहागत:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
अनघ! मैं यहीं आपके पास रहना चाहता हूँ। प्रभु! मैं आपकी इच्छानुसार सब कार्य करता हुआ यहीं रहूँगा।' युधिष्ठिर के वचन सुनकर राजा विराट अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले- 'ब्रह्मन्! आपका स्वागत है।' तत्पश्चात उन्होंने राजाओं में श्रेष्ठ युधिष्ठिर का आदरपूर्वक स्वागत किया। उनका स्वागत करके राजा विराट ने प्रसन्न मन से उनसे कहा- 'पिताजी! मैं आपसे प्रेमपूर्वक पूछ रहा हूँ कि आप इस समय किस राजा के राज्य से यहाँ आये हैं?'॥9-10॥
 
Anagh! I want to stay here near you. Prabhu! I will stay here doing all the work as you wish.' Hearing Yudhishthira's words, King Virat became very happy and said- 'Brahman! You are welcome.' Thereafter he respectfully received Yudhishthira, the best of kings. After receiving him, King Virat said to him with a happy heart- 'Father! I am asking you lovingly, from which king's kingdom have you come here at this time?॥ 9-10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)