श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 68: राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  4.68.9 
वैशम्पायन उवाच
राजा विराटोऽथ भृशाभितप्त:
श्रुत्वा सुतं त्वेकरथेन यातम्।
बृहन्नलासारथिमाजिवर्धनं
प्रोवाच सर्वानथ मन्त्रिमुख्यान्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! राजा विराट को यह सुनकर बड़ा दुःख हुआ कि युद्ध में आगे बढ़ता हुआ उनका पुत्र बृहन्नला नामक सारथी के साथ एक ही रथ के सहारे कौरवों का सामना करने के लिए गया है। उन्होंने अपने समस्त प्रधान मंत्रियों से कहा -॥9॥
 
Vaishampayana says - Janamejaya! King Virata was very saddened to hear that his son, who was advancing in the war, had gone to face the Kauravas with the help of a single chariot with charioteer Brihannala. He said to all his chief ministers -॥9॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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