श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 68: राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  4.68.76 
तेषां भयाभिपन्नानां सर्वेषां बलशालिनाम्।
नूनं प्रकाल्य तान् सर्वांस्त्वया युधि नरर्षभ।
आच्छिन्नं गोधनं सर्वं शार्दूलेनामिषं यथा॥ ७६॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषोत्तम! तुमने युद्ध में उन समस्त शत्रुओं को परास्त करके उन्हें भयभीत कर दिया है और उन समस्त बलवानों के हाथ से अपने समस्त पशुओं को उसी प्रकार छीन लिया है, जैसे सिंह अन्य पशुओं के हाथ से मांस छीन लेता है।
 
Best of men! You have defeated all those enemies in the war and put them in fear and snatched all your cattle from the hands of all those powerful men, just as a lion snatches meat from the hands of other animals.
 
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि विराटोत्तरसंवादे अष्टषष्टितमोऽध्याय:॥ ६८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें विराट-उत्तर-संवादविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६८॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ७९ श्लोक हैं।)
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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