श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 68: राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना  »  श्लोक 73
 
 
श्लोक  4.68.73 
रणे यं प्रेक्ष्य सीदन्ति हृतस्वा वणिजो यथा।
कृपेण तेन ते तात कथमासीत् समागम:॥ ७३॥
 
 
अनुवाद
बेटा! जैसे धन छिन जाने पर व्यापारी दुःखी हो जाते हैं, वैसे ही कृपाचार्य के साथ तुम्हारा युद्ध किस प्रकार हुआ, जिन्हें देखकर बड़े-बड़े योद्धा भी युद्ध में दुर्बल हो जाते हैं ॥ 73॥
 
Son! Just as merchants become sad when their wealth is snatched away, similarly how did your fight with Kripacharya take place, seeing whom even the greatest warriors become weak in the war?॥ 73॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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