श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 68: राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना  »  श्लोक 69-70
 
 
श्लोक  4.68.69-70 
पदं पदसहस्रेण यश्चरन् नापराध्नुयात्।
तेन कर्णेन ते तात कथमासीत् समागम:॥ ६९॥
मनुष्यलोके सकले यस्य तुल्यो न विद्यते।
तेन भीष्मेण ते तात कथमासीत् समागम:॥ ७०॥
 
 
अनुवाद
पिताश्री! जो एक ही लक्ष्य के साथ हजारों बाणों को मार गिराता है और कभी चूकता नहीं, उस कर्ण के साथ आपने किस प्रकार युद्ध किया? पुत्र! सम्पूर्ण मानव-जगत् में जिसकी कोई बराबरी नहीं है, उस भीष्म के साथ आपने किस प्रकार युद्ध किया?॥69-70॥
 
Father! How did you fight with Karna, who shoots arrows to hit thousands of targets along with a single target and never misses? Son! How did you fight with Bhishma, who has no equal in the entire human world?॥ 69-70॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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