श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 68: राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  4.68.64 
यदि ह्येतत् पतेद् भूमौ रुधिरं मम नस्तत:।
सराष्ट्रस्त्वं महाराज विनश्येथा न संशय:॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
महाराज! यदि मेरी नाक से बहता हुआ यह रक्त भूमि पर गिर जाता, तो समस्त राष्ट्र के साथ आपका भी नाश हो जाता; इसमें कोई संदेह नहीं है॥ 64॥
 
‘Maharaj! If this blood flowing from my nose had fallen on the ground, you would have perished along with the whole nation; there is no doubt about it.॥ 64॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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