श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 68: राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना  »  श्लोक 63
 
 
श्लोक  4.68.63 
क्षमयन्तं तु राजानं पाण्डव: प्रत्यभाषत।
चिरं क्षान्तमिदं राजन् न मन्युर्विद्यते मम॥ ६३॥
 
 
अनुवाद
राजा को क्षमा माँगते देख पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर बोले, 'हे राजन! मैंने बहुत समय पहले क्षमा-व्रत धारण कर रखा है, अतः आपका यह अपराध क्षमा हो गया। मैं आप पर तनिक भी क्रोध नहीं कर रहा हूँ।'
 
Seeing the king asking for forgiveness, Yudhishthira, the son of Pandu, said, 'O King! I have taken a vow of forgiveness since a long time, so this crime of yours has been forgiven. I am not angry with you at all. 63.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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