श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 68: राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना  »  श्लोक 62
 
 
श्लोक  4.68.62 
वैशम्पायन उवाच
स पुत्रस्य वच: श्रुत्वा विराटो राष्ट्रवर्धन:।
क्षमयामास कौन्तेयं भस्मच्छन्नमिवानलम्॥ ६२॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! अपने पुत्र की यह बात सुनकर, राष्ट्र को समृद्ध करने वाले राजा विराट ने भस्म में छिपे हुए अग्नि के समान तेजस्वी कुन्तीनन्दपुत्र युधिष्ठिर से क्षमा मांगी॥62॥
 
Vaishampayanji says- Rajan! Hearing this from his son, King Virat, who had made his nation prosperous, sought forgiveness from Yudhishthira, the son of Kuntinand who was as bright as fire hidden in the ashes. 62॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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