श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 68: राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  4.68.57 
वैशम्पायन उवाच
ततो राज्ञ: सुतो ज्येष्ठ: प्राविशत् पृथिवीञ्जय:।
सोऽभिवाद्य पितु: पादौ कङ्कं चाप्युपतिष्ठत॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात राजा विराट के ज्येष्ठ पुत्र कुमार भूमिंजय (उत्तर) ने भीतर प्रवेश किया और अपने पिता के दोनों चरणों में प्रणाम करके कंक को भी मस्तक नवाया॥57॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Thereafter, Kumar Bhuminjay (North), the eldest son of King Virat, entered inside and after paying obeisance at both the feet of his father, he also bowed his head to Kanka. 57॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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