श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 68: राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  4.68.55 
एतस्य हि महाबाहो व्रतमेतत् समाहितम्।
यो ममाङ्गे व्रणं कुर्याच्छोणितं वापि दर्शयेत्।
अन्यत्र संग्रामगतान्न स जीवेत् कथञ्चन॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
महाबाहो! बृहन्नला की यह निश्चित प्रतिज्ञा है कि जो कोई युद्धभूमि के अतिरिक्त अन्य किसी स्थान पर मेरे शरीर को घायल करेगा अथवा रक्त बहाएगा, वह किसी भी स्थिति में जीवित न बचे ॥ 55॥
 
Mahabaho! It is a fixed vow of Brihannala that whoever wounds my body or shows bleeding at any place other than the battlefield should not be able to survive under any circumstances. ॥ 55॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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