श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 68: राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  4.68.46 
वैशम्पायन उवाच
तत: प्रकुपितो राजा तमक्षेणाहनद् भृशम्।
मुखे युधिष्ठिरं कोपान्नैवमित्येव भर्त्सयन्॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: जनमेजय! ऐसा कहकर राजा विराट ने क्रोध में भरकर पासे युधिष्ठिर के मुँह पर जोर से फेंके और क्रोधपूर्वक डाँटते हुए कहा - 'ऐसा वचन फिर कभी मत कहना।'
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! Having said this, King Virata, filled with rage, threw the dice forcefully on Yudhishthira's face and angrily scolded him saying, 'Never say such a thing again.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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