श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 68: राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  4.68.45 
विराट उवाच
बहुश: प्रतिषिद्धोऽसि न च वाचं नियच्छसि।
नियन्ता चेन्न विद्येत न कश्चिद् धर्ममाचरेत्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
विराट बोले - कंक! मैंने तुम्हें कई बार मना किया है, फिर भी तुम अपना मुँह बंद नहीं कर रहे हो। यह सत्य है, यदि शासन करने के लिए राजा न हो, तो कोई भी धर्म का पालन नहीं कर सकता।
 
Virat said - Kank! I have forbidden you many times, still you are not shutting your mouth. It is true, if there is no king to rule, then no one can follow the religion. 45.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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