श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 68: राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना  »  श्लोक 39-40
 
 
श्लोक  4.68.39-40 
वाच्यावाच्यं न जानीषे नूनं मामवमन्यसे।
भीष्मद्रोणमुखान् सर्वान् कस्मान्न स विजेष्यति॥ ३९॥
वयस्यत्वात् तु ते ब्रह्मन्नपराधमिमं क्षमे।
नेदृशं तु पुनर्वाच्यं यदि जीवितुमिच्छसि॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
तुम्हें यह नहीं मालूम कि क्या कहना चाहिए और क्या नहीं। तुम अपने वचनों से निश्चय ही मेरा अपमान कर रहे हो। मेरा पुत्र भीष्म और द्रोण आदि वीर योद्धाओं को क्यों नहीं परास्त कर सकेगा? हे ब्रह्मन्! तुम्हारा मित्र होने के नाते मैं तुम्हारे इस अपराध को क्षमा करता हूँ। यदि तुम जीवित रहना चाहते हो, तो ऐसी बातें फिर कभी मत कहना।॥39-40॥
 
You do not know what to say and what not to say. You are definitely insulting me with your words. Why will my son not defeat all the brave warriors like Bhishma and Drona? O Brahman! Being your friend, I forgive you for this crime. If you wish to live, then do not say such things again.'॥ 39-40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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