श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 68: राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  4.68.33 
कङ्क उवाच
किं ते द्यूतेन राजेन्द्र बहुदोषेण मानद।
देवने बहवो दोषास्तस्मात् तत् परिवर्जयेत्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
कंक ने कहा - हे सबका आदर करने वाले राजन! आपको जुए से क्या लेना-देना? उसमें अनेक दोष हैं। जुए में अनेक दोष हैं, अतः उसे त्याग देना चाहिए॥33॥
 
Kank said - O King who respects everyone! What do you have to do with gambling? There are many faults in it. There are many faults in gambling, so it should be abandoned. ॥ 33॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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