| श्री महाभारत » पर्व 4: विराट पर्व » अध्याय 68: राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना » श्लोक 31 |
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| | | | श्लोक 4.68.31  | न देवितव्यं हृष्टेन कितवेनेति न: श्रुतम्।
तं त्वामद्य मुदा युक्तं नाहं देवितुमुत्सहे।
प्रियं तु ते चिकीर्षामि वर्ततां यदि मन्यसे॥ ३१॥ | | | | | | अनुवाद | | 'राजन्! मैंने सुना है कि जब कोई चतुर जुआरी बहुत प्रसन्न हो, तो उसके साथ जुआ नहीं खेलना चाहिए। आज आप भी बहुत प्रसन्न हैं; इसलिए मुझे आपके साथ जुआ खेलने का साहस नहीं है; तथापि मैं आपका प्रिय कार्य करना चाहता हूँ, अतः यदि आपकी इच्छा हो, तो खेल शुरू हो सकता है।'॥31॥ | | | | ‘King! I have heard that when a clever gambler is very happy, one should not gamble with him. Today you are also very happy; therefore I do not have the courage to gamble with you, however I want to do your favourite work, so if you wish, the game can begin.'॥ 31॥ | | ✨ ai-generated | | |
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