श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 68: राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  4.68.27-28 
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा चेदं वचनं पार्थिवस्य
सर्वं पुरं स्वस्तिकपाणिभूतम्।
भेर्यश्च तूर्याणि च वारिजाश्च
वेषै: परार्घ्यै: प्रमदा: शुभाश्च॥ २७॥
तथैव सूतै: सह मागधैश्च
नान्दीवाद्या: पणवास्तूर्यवाद्या:।
पुराद् विराटस्य महाबलस्य
प्रत्युद्ययु: पुत्रमनन्तवीर्यम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन! राजा की यह आज्ञा सुनकर सौभाग्यशाली युवतियों, सूत, मागध और बंदीगणों सहित समस्त ग्रामवासी, बहुमूल्य वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर, भेरी, तूर्य, शंख और पणव आदि शुभ वस्तुएं हाथों में लेकर महाबली विराट के सनातन पराक्रमी पुत्र उत्तर का स्वागत करने के लिए नगर से बाहर चले गए॥27-28॥
 
Vaishampayanji says- Rajan! Hearing this order of the king, all the villagers including fortunate young women, Suta, Magadha and prisoners, adorned with precious costumes, carrying auspicious objects in their hands like Bheri, Turya, Conch and Panava etc., went out of the city to welcome Uttar, the eternally mighty son of the mighty Virat. 27-28॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd