| श्री महाभारत » पर्व 4: विराट पर्व » अध्याय 68: राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना » श्लोक 20-d1 |
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| | | | श्लोक 4.68.20-d1  | युधिष्ठिर उवाच
दिष्टॺा विनिर्जिता गाव: कुरवश्च पलायिता:।
नाद्भुतं त्वेव मन्येऽहं यत् ते पुत्रोऽजयत् कुरून्॥ २०॥
ध्रुव एव जयस्तस्य यस्य यन्ता बृहन्नला।
(देवेन्द्रसारथिश्चैव मातलिर्लघुविक्रम:।
कृष्णस्य सारथिश्चैव न बृहन्नलया समौ॥ ) | | | | | | अनुवाद | | युधिष्ठिर ने कहा- महाराज! सौभाग्यवश गौएँ जीत ली गईं और कौरव भाग गए। आपके पुत्र ने कौरवों पर विजय प्राप्त कर ली, इसमें मुझे कोई आश्चर्य नहीं लगता। जिसका सारथि बृहन्नला हो, उसकी विजय निश्चित है। देवराज इन्द्र का तीव्रगामी सारथि मातलि और श्रीकृष्ण का सारथि दारुक, ये दोनों ही बृहन्नला की बराबरी नहीं कर सकते। 20 1/2॥ | | | | Yudhishthir said- Maharaj! Fortunately, the cows were won and the Kauravas fled. I do not consider it surprising that your son has won over the Kauravas. The one whose charioteer is Brihannala, his victory is certain. Matali, the fast-moving charioteer of Devraj Indra and Daruk, the charioteer of Shri Krishna, both of them cannot be equal to Brihannala. 20 1/2॥ | | ✨ ai-generated | | |
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