श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 68: राजा विराटकी उत्तरके विषयमें चिन्ता, विजयी उत्तरका नगरमें प्रवेश, प्रजाओंद्वारा उनका स्वागत, विराटद्वारा युधिष्ठिरका तिरस्कार और क्षमा-प्रार्थना एवं उत्तरसे युद्धका समाचार पूछना  »  श्लोक 15-16
 
 
श्लोक  4.68.15-16 
वैशम्पायन उवाच
तमब्रवीद् धर्मराजो विहस्य
विराटराजं तु भृशाभितप्तम्।
बृहन्नला सारथिश्चेन्नरेन्द्र
परे न नेष्यन्ति तवाद्य गास्ता:॥ १५॥
सर्वान् महीपान् सहितान् कुरूंश्च
तथैव देवासुरसिद्धयक्षान्।
अलं विजेतुं समरे सुतस्ते
स्वनुष्ठित: सारथिना हि तेन॥ १६॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! राजा विराट को अत्यन्त दुःखी देखकर धर्मराज युधिष्ठिर ने उनसे मुस्कुराते हुए कहा- 'नरेन्द्र! यदि बृहन्नला सारथि हैं, तो निश्चय मानिए कि आज शत्रु आपकी गौएँ नहीं ले जा सकेंगे। उस मित्र सारथि की सहायता से समस्त कार्यों को ठीक प्रकार से संपन्न करके आपका पुत्र युद्ध में न केवल संगठित रूप से आये हुए समस्त राजाओं और कौरवों पर, अपितु देवताओं, दानवों, सिद्धों और यक्षों पर भी अवश्य विजय प्राप्त कर सकेगा।'॥15-16॥
 
Vaishampayana says- Janamejaya! Seeing King Virat very sad, Dharmaraja Yudhishthira said to him smilingly- 'Narendra! If Brihannala is the charioteer, then rest assured that the enemy will not be able to take away your cows today. After doing all the tasks properly with the help of that friendly charioteer, your son can certainly win in the war not only over all the kings and the Kauravas who have come in an organized manner, but also over the Gods, Demons, Siddhas and Yakshas.'॥ 15-16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)