न त्वेष बीभत्सुरलं नृशंसं
कर्तुं न पापेऽस्य मनो विशिष्टम्॥ २१॥
त्रैलोक्यहेतोर्न जहेत् स्वधर्मं
सर्वे न तस्मान्निहता रणेऽस्मिन्।
क्षिप्रं कुरून् याहि कुरुप्रवीर
विजित्य गाश्च प्रतियातु पार्थ:।
मा ते स्वकोऽर्थो निपतेत मोहात्
तत् संविधातव्यमरिष्टबन्धम्॥ २२॥
अनुवाद
'यह अर्जुन कभी क्रूरता नहीं कर सकता। इसका मन पाप कर्मों की ओर कभी प्रवृत्त नहीं होता। यह त्रिलोकी के राज्य के लिए भी अपने धर्म को नहीं छोड़ सकता। यही कारण है कि इसने इस युद्ध में हमारे प्राण नहीं लिए। कुरुवंश के प्रधान योद्धा! अब तुम्हें शीघ्र ही कुरुदेश लौट जाना चाहिए। अर्जुन भी गौओं को जीतकर लौट जाए। अब ध्यान रखना कि आसक्ति के कारण तुम्हारा अपना स्वार्थ नष्ट न हो जाए। सबको वही कर्म करना चाहिए जिससे अपना कल्याण हो।'॥21-22॥
‘This Arjuna can never behave cruelly. His mind never gets inclined towards sinful acts. He cannot leave his Dharma even for the kingdom of Triloki. This is the reason why he did not take our lives in this war. Chief warrior of Kuru clan! Now you should return to Kurudesh soon. Arjuna should also return after winning the cows. Now take care that your own self-interest is not destroyed due to attachment. Everyone should do only that work which brings welfare to oneself.’॥ 21-22॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥