श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 64: अर्जुन और भीष्मका अद्‍भुत युद्ध तथा मूर्च्छित भीष्मका सारथिद्वारा रणभूमिसे हटाया जाना  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  4.64.35 
निष्पतन्तो रथात् तस्य धौता हैरण्यवासस:।
आकाशे समदृश्यन्त हंसानामिवपङ्‍‍क्तय:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
उसके रथ से निकलते हुए सुनहरे पंखों वाले श्वेत बाण आकाश में हंसों की पंक्ति के समान प्रतीत हो रहे थे।
 
The white arrows with golden feathers issuing from his chariot looked like a line of swans in the sky. 35.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)