श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 64: अर्जुन और भीष्मका अद्‍भुत युद्ध तथा मूर्च्छित भीष्मका सारथिद्वारा रणभूमिसे हटाया जाना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  4.64.28 
निमेषान्तरमात्रेण भीष्मोऽन्यत् कार्मुकं रणे।
समादाय महाबाहु: सज्यं चक्रे महारथ:।
शरांश्च सुबहून् क्रुद्धो मुमोचाशु धनंजये॥ २८॥
 
 
अनुवाद
परन्तु उस विशाल भुजा वाले महाबली योद्धा भीष्म ने पलक झपकते ही दूसरा धनुष उठा लिया, उस पर प्रत्यंचा चढ़ाई और क्रोध में आकर धनंजय पर अनेक बाण चलाये।
 
But that huge-armed mighty warrior Bhishma took up another bow in the blink of an eye, strung it, and in a fit of rage shot many arrows at Dhananjaya.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)