श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 63: अर्जुनपर समस्त कौरवपक्षीय महारथियोंका आक्रमण और सबका युद्धभूमिसे पीठ दिखाकर भागना  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  4.63.11-12 
यथा वर्षति पर्जन्ये विद्युद् विभ्राजते दिवि।
द्योतयन्ती दिश: सर्वा: पृथिवीं च समन्तत:॥ ११॥
तथा दश दिश: सर्वा: पतद्‍गाण्डीवमावृणोत्।
नागाश्च रथिन: सर्वे मुमुहुस्तत्र भारत॥ १२॥
 
 
अनुवाद
जैसे मेघों के बरसने पर आकाश में बिजली चमकती है और वह सब दिशाओं और पृथ्वी को सब ओर से प्रकाशित कर देती है, उसी प्रकार गाण्डीव धनुष बाणों की वर्षा करता हुआ दसों दिशाओं को पूर्णतः आच्छादित कर रहा था। हे जनमेजय! उस समय वहाँ उपस्थित हाथीसवार और सारथि सहित सभी सैनिक मोहित (बेहोश) हो रहे थे। ॥11-12॥
 
Just as lightning flashes in the sky when clouds are raining and it illuminates all directions and the earth from all sides, similarly the Gandiva bow, while raining arrows, completely covered all the ten directions. O Janamejaya! At that time all the soldiers there, including elephant riders and charioteers, were becoming mesmerized (unconscious). ॥ 11-12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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