श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 61: अर्जुनका उत्तरकुमारको आश्वासन तथा अर्जुनसे दु:शासन आदिकी पराजय  »  श्लोक 7-8
 
 
श्लोक  4.61.7-8 
अदृष्टपूर्व: शूराणां मया संख्ये समागम:।
गदापातेन महता शङ्खानां नि:स्वनेन च॥ ७॥
सिंहनादैश्च शूराणां गजानां बृंहितैस्तथा।
गाण्डीवशब्देन भृशमशनिप्रतिमेन च।
श्रुति: स्मृतिश्च मे वीर प्रणष्टा मूढचेतस:॥ ८॥
 
 
अनुवाद
'मैंने युद्ध में योद्धाओं का इतना विशाल समूह पहले कभी नहीं देखा। हे वीर योद्धा! गदाओं के भारी प्रहार, शंखों की भयानक ध्वनि, योद्धाओं की गर्जना, हाथियों की चिंघाड़ और गाण्डीव धनुष की गर्जना के समान भारी टंकार से मेरा मन मोहित हो गया है। मेरी श्रवण शक्ति और स्मरण शक्ति भी नष्ट हो गई है।' 7-8
 
‘I have never seen such a large gathering of warriors in battle before. O brave warrior! My mind has been mesmerized by the heavy blows of maces, the terrifying sound of conches, the roars of warriors, the trumpeting of elephants and the heavy twang of the Gandiva bow, which is like the thunder of thunder. My hearing and memory have also failed. 7-8.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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