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श्लोक 4.61.33  |
वैशम्पायन उवाच
एवमाश्वासितस्तेन वैराटि: सव्यसाचिना।
व्यवागाहद् रथानीकं भीमं भीष्माभिरक्षितम्॥ ३३॥ |
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| अनुवाद |
| वैशम्पायनजी कहते हैं- जनमेजय! सव्यसाची अर्जुन द्वारा इस प्रकार सान्त्वना दिये जाने पर विराटकुमार उत्तर भीष्मजी द्वारा चारों ओर से सुरक्षित किये गये महारथियों की दुर्जेय सेना में घुस गये। 33॥ |
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| Vaishampayanji says – Janamejaya! On thus being consoled by Savyasachi Arjuna, Viratakumar Uttara entered the formidable army of charioteers protected from all sides by Bhishmaji. 33॥ |
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