श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 61: अर्जुनका उत्तरकुमारको आश्वासन तथा अर्जुनसे दु:शासन आदिकी पराजय  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  4.61.24 
असम्भ्रान्तो रथे तिष्ठ समेषु विषमेषु च।
दिवमावृत्य तिष्ठन्तं गिरं भिन्द्यां स्म पत्रिभि:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
तुम बिना किसी हिचकिचाहट के (ऊँचे-नीचे) ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर (सावधानी से) रथ चलाओ (और घोड़ों की देखभाल करो)। आज मैं अपने बाणों से सम्पूर्ण आकाश को घेरे हुए (महान) पर्वत को भी बींध डालूँगा।
 
‘You should ride the chariot without any hesitation (carefully) on uneven (high and low) terrains (and take care of the horses). Today I shall pierce even the (great) mountain standing encircling the whole sky with my arrows.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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