श्री महाभारत  »  पर्व 4: विराट पर्व  »  अध्याय 61: अर्जुनका उत्तरकुमारको आश्वासन तथा अर्जुनसे दु:शासन आदिकी पराजय  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  4.61.21 
पाणिपादशिर:पृष्ठबाहुशाखानिरन्तरम्।
वनं कुरूणां छेत्स्यामि शरै: संनतपर्वभि:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
‘आज मैं अपने मुड़ी हुई गांठों वाले बाणों से कौरव सेना के वन को काट डालूँगा। हाथ, पैर, सिर, पीठ और भुजाएँ आदि नाना शाखाओं के रूप में फैलकर इस कौरव वन को घना कर दिया है।॥ 21॥
 
‘Today I will cut down the forest of the Kaurava army with my arrows having bent knots. The hands, legs, head, back and arms etc. have spread out in the form of various branches and have made this Kaurava forest dense.॥ 21॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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